कल विनोद कापड़ी की फिल्म ‘पायर’ को ब्लैक नाईट इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल की बेस्ट फिल्म का ऑडिएंस अवार्ड हासिल हुआ.
इस बरस मार्च-अप्रैल का समय रहा होगा. विनोद और उसकी पूरी टीम की दिन-रात की मेहनत के बाद कुछ महीनों से ‘पायर’ दिखाए जाने के लिए तैयार थी. पोस्ट-प्रोडक्शन के सारे काम निबट चुके थे. यह सबसे आसान होता कि फिल्म के राइट्स किसी डिस्ट्रीब्यूटर को या किसी ओटीटी प्लेटफोर्म को बेच दिए जाते. इससे इतना होता कि फिल्म रिलीज़ हो जाती और उसके प्रोडक्शन में लगी लागत निकल आती. फिल्म से जुड़े लोग दूसरे कामों में लग जाते.
उन दिनों हो यह भी रहा था कि जिस-जिस फेस्टिवल में फिल्म भेजी जाती, वहां से रिजेक्ट होकर आ जाती. मैंने पहले भी लिखा था विनोद को यह फिल्म बनाने में कैसी-कैसी अनामंत्रित आर्थिक विपत्तियों का सामना करना पड़ा था. उसे वह गाड़ी भी बेच देनी पड़ी थी जिसे उसने बड़ी हौस से खरीदा था. सुदूर पहाड़ी इलाके में शूटिंग करने की जिद से जुड़ीं हज़ार तरह की अलग दिक्कतें.
फिल्म की शूटिंग ख़त्म हुए लम्बा अरसा बीत चुका था. नायक की भूमिका निभा रहे पदम सिंह की पत्नी, जो पूरी शूटिंग भर यूनिट के साथ हर लोकेशन पर हुआ करती थीं, का इंतकाल हो चुका था. अंत्येष्टि के कुछ घंटों बाद जब विनोद और मैं गाँव में उनके घर के बाहर अहाते में बैठे थे, मुझे उनके चेहरे पर गहरी हताशा और पराजय साफ़ दिखाई दिए. इशारों में जैसे वे विनोद से कह भी रहे थे कि बेटा तूने मेहनत तो बहुत की पर मुझे मालूम हैं इस फिल्म का कुछ बनने-बनाने वाला नहीं. ऊपर से यह हुआ कि दो-तीन हफ़्तों के भीतर खुद उन्हें एक गंभीर बीमारी निकल आई. विनोद उन्हें दिल्ली ले आया और उनका इलाज शुरू हुआ जो अब भी जारी है.
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वह निराशा और कुंठा का अन्धेरा दौर था. कोई रास्ता न सूझता था. मन बहुत खराब होता तो विनोद आवारागर्दी पर निकल जाता. कई बार उसके साथ मैं भी होता, कई बार वह अकेला चला जाता.
आख़िरकार इसी बरस 19 जुलाई को एस्टोनिया से न्यौता आया. ‘पायर’ का बाकायदा वर्ल्स प्रीमियर होना तय हुआ – वह भी प्रतिष्ठित ब्लैक नाईट इंटरनेशल फिल्म फेस्टिवल में.
उसके बाद चीज़ें किसी परीकथा की तरह घटती चली गईं – हीरा देवी और पदम सिंह को टालिन ले जाए जाने का निर्णय, साक्षी द्वारा दोनों के लिए ठेठ कुमाऊनी वार्डरोब का तैयार किया जाना, दोनों की पहली हवाई यात्रा, उनका पहला फाइव-स्टार होटल, संसार के चुनिन्दा दर्शकों के सामने वर्ल्ड प्रीमियर और दुनिया भर के मीडिया-अखबारों में मिली वाहवाही.
बहुत से लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि मैं इस फिल्म पर इतना अधिक क्यों लिख रहा हूँ. विनोद के प्रेम के चलते फिल्म के पोस्टर में मेरा नाम सह-निर्माता के तौर पर आया है. इस लिहाज से मैं बगैर एक भी पैसा खर्च किये भारतीय फिल्म-उद्योग का संभवतः सबसे कंगाल फिल्म-निर्माता बन गया हूँ. यह भी अपनी किस्म का एक रेकॉर्ड होना चाहिए. प्रमाणित किये जाने की नीयत से मैं जल्द ही गिनीज़ बुक वालों को लिखने की सोच रहा हूँ.
जो भी हो, कह सकता हूँ कि मैं बहुत दिनों बाद बहुत खुश हूँ. इस खुशी के लिए विनोद और साक्षी, दोनों का शुक्रिया !
(प्रसिद्ध लेखक, अनुवादक और इस फिल्म के सह निर्माता अशोक पांडे के फेवबुक से साभार। आप वास्तविकता महसूस करें इसलिए इसे हूबहू दिया जा रहा है।)






