ग्रामीण क्षेत्र में पानी के स्रोतों के प्रबंधन, ग्रामीणों के आजीविका संवर्धन के लिए संचालित जलागम (ग्राम्या) परियोजना में गबन करने वाले दो ग्राम प्रधान और परियोजना कार्मिक को जेल की सजा मिली है। तीनों अभियुक्त 2007-2013 के बीच संचालित उत्तरांचल विकेंद्रकृत जलागम विकास परियोजना का अनुदान खा गए। न्यायिक मजिस्ट्रेट गरुड़ बागेश्वर ने तीनों को दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई।
जलागम परियोजना के तहत अनुदान पर पशु आवास निर्माण, हार्वेस्टिंग टैंक बनना था। जिसका लाभ लाभार्थियों को नहीं मिला। फर्जी एवं कूटरचित बिल बनाकर शासकीय अनुदान की धनराशि गबन की गई। जिसके आरोपित तत्कालीन ग्राम प्रधान गोविंद देवी, उत्तरवर्ती प्रधान विरेंद्र सिंह व तकनीकी प्रबंधक बद्री दत्त पंत पर धन हड़पने तथा दुर्विनियोग का आरोप था। वादी बाग सिंह ने सूचना के अधिकार में जानकारी मांगी। ग्रामीणों से पूछा कि जलागम से उन्हें पशु आवास के लिए धनराशि मिली। जिस पर ग्रामीणों ने अनभिज्ञता व्यक्त की। पूर्व ग्राम प्रधान मवई विरेंद्र सिंह ने हार्वेस्टिंग टैंक के निर्माण के लिए जिन लोगों का रुपया आहरित किया उनमें अधिकतर लोगों को भुगतान नहीं हुआ। बिल वाउचर तकनीकी प्रबंधक बद्री दत्त पंत ने फर्जी तैयार किए।
23 गवाह, 193 साक्ष्य किए प्रस्तुत
बैजनाथ थाने में प्राथमिकी होने के बाद मामला न्यायालय में चला। सहायक अभियोजन अधिकारी गौरव अग्रवाल ने बताया कि अभियोजन पक्ष ने मामले में 23 गवाह परीक्षित कराए। 193 अभिलेखीय साक्ष्य प्रदर्शित किए। न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अभियुक्त गोविंदी देवी, विरेंद्र सिंह तथा बद्री दत्त पंत को जेल की सजा सुनाने के साथ अर्थदंड लगाया।





