संत महापुरुष ने मानव समाज को आत्मज्ञान देने का काम किया है। यही आत्मज्ञान ही मानव की आत्म शक्ति कहलाती है। आठ नवंबर 1900 में जन्मे योगीराज परम संत हंस महाराज का प्रगटीकरण पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड में हुआ था। जिन्होंने हजारों लोगों को आत्मज्ञान देकर उनके मानव तन को सार्थक बनाया। हंस महाराज ने देश के अनेकों गांवों-नगरों, शहरों में पैदल, बैलगाड़ी, तांगे या रेल गाड़ी से सफर कर आत्मज्ञान का प्रचार-प्रसार किया। गुरु महाराज का मानना था कि भगवान के दर्शन के लिए तंत्र-मंत्र अथवा कर्मकांड तीरथ, व्रत करने की जरूरत नहीं है। उनका कहना था परम शक्ति के दर्शन किसी स्थान पर नहीं हो सकते। परमात्मा को हर प्राणी में मौजूद बताने वाले महाराज कहते वह प्रकाश स्वरूप परमात्मा हमें तभी दिखाई देगा जब उसके दर्शनों की विधि सदगुरु महाराज जिज्ञासु को जान लेते हैं।
दुनिया का हर व्यक्ति बने आत्मज्ञानी
महाराज चाहते थे देश-दुनिया का हर व्यक्ति आत्मज्ञानी बने चाहे वह राजा है या गरीब या भिखारी है। क्योंकि उनके जीवन काल में सारी दुनिया में पहले और दूसरे विश्व युद्ध सन 1900 में ही लड़े गए थे। इन दोनों युद्ध में करोड़ों लोग मृत्यु की गोद में चले गए थे। जापान के दो शहर हिरोशिमा और नागासाकी एटम बम की भेंट चढ़ चुके थे। कुछ राष्ट्रीय अध्यक्षों के अभियान एवं अहंकार के कारण सारी पृथ्वी शमशान बनती जा रही थी। बताया जाता है कि दूसरा विश्व युद्ध एक सितंबर 1939 से दो सितंबर 1945 तक लड़ा गया। उसमें लगभग सात करोड लोग मारे गए थे। बारूद से ज्यादा खतरनाक और घातक कहे जाने वाले परमाणु हथियारों का निर्माण दुनिया के कई देश कर रहे थे और जिनके पास ऐसी घातक हथियार नहीं थे उन देशों में विश्व युद्ध के बाद परमाणु बम बनाने शुरू कर दिए थे।
हथियार से विनाश ही होगा
एक बार हंस जी महाराज ने किसी राजनेता से पूछा आप लोग परमाणु हथियारों की खरीद-फरोख्त और निर्माण क्यों कर रहे हैं। जवाब मिला देश की सुरक्षा के लिए। महाराज ने कहा जो हथियार पृथ्वी को तहस-नहस करने की क्षमता रखते हैं उनसे लोगों की सुरक्षा आप कैसे करेंगे। जब यह धरती पर गिराए जाएंगे तो इंसान ही नहीं अन्य प्राणी भी मारे जाएंगे। आप इन हथियारों से ही सुरक्षा करने के सपने दिखा रहे हैं। आपकी इस सोच पर अफसोस होता है। जब धरती पर गिरकर फूटेंगे तब प्राणियों की मृत्यु तो निश्चित होगी। साथ ही धरती भी इतनी संक्रमित हो जाएगी की फिर धरती पर 40-50 सालों तक वनस्पति तक नहीं हो पाएगी। अब आप ही बताइए इनसे मानव की सुरक्षा हुई या विनाश हुआ। महाराज की बात सुनकर नेताजी बगले झांकने लगे। उनसे कोई जवाब देते नहीं बना।
हथियारों की होड़ छोड़नी होगी
महाराज ने कहा यदि वास्तव में आप लोग देश-दुनिया को सुरक्षित रखना चाहते हैं तो इन हथियारों की होड़ छोड़िए और मानव समाज को कुछ ऐसा ज्ञान दीजिए जिससे मानव के मन में सदभावना के बीज अंकुरित हो। जिससे देश-जहान में शांति, प्रेम, आपसी भाई-चारा बढ़े। जब तक आदमी के मन में नफरत भरी रहेगी तो सारी धरती अपना सौंदर्य खोती चली जाएगी। आत्मज्ञान ही परम ज्ञानअब सवाल उठता है कि ऐसा कौन-सा ज्ञान है जो मानव मन को बदल सके। इस पर महाराज जी ने बताया कि वह ज्ञान है आत्मा का। हमने जितने भी लोगों को यह आत्मज्ञान दिया उनका जीवन जो एक पहले अपराध युक्त था अब वह सब नेक और धर्मात्मा बन गए हैं। आत्मज्ञान में इतनी शक्ति है कि वह आदमी के मानसिक एवं शारीरिक रोग व शोक मिटा सकता है। यह ज्ञान आदमी के मन को बदलकर रख देता है।
एटम बम की नहीं पड़ेगी जरूरत
महाराज ने कहा यह अटल सत्य है, जब हर इंसान के मन में शांति होगी तो फिर किसी भी राष्ट्र को एटम बम बनाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। एटम बमों से जो विनाश हिरोशिमा और नागासाकी शहरों पर हुआ उसका वर्णन करते हुए भी आत्मा कांपने लगती है। जब गिराने वाले पायलट और सह पायलट भी उस मंजर को देखकर दहल उठे थे! ‘एनोलाग’ विमान के सह पायलट कैप्टन रॉबर्ट लुईस ने अपनि लॉगबुक में जो शब्द लिखे थे, वे थे “वोह माय गॉड व्हाट हैव वी डन” हे भगवान! यह हमने क्या किया। सुनने मात्र से कांप जाती आत्मा3.5 मीटर लंबा 4 टन वजन वाला लिटिल बॉय नाम का नीला सफेद रंगों वाला एटम बम जब विमान से गिरने के बाद 43वे सेकंड में धरती से टकराकर फटा तो इतना जबरदस्त धमाका हुआ कि जीरो ग्राउंड से 15 किमी दूर तक की बिल्डिंगों के शीशे चकनाचूर हो गए। एक सेकंड में 12530 टीएनटी वाले इस अमेरिकी परमाणु बम से आग का विशाल गोला निकला जिससे मशरूम की आकृति बन कर भयानक तांडव मचा दिया। कुछ क्षणों में ही सड़को, गलियों तथा बिल्डिंगों में जली हुई लाशों के ढेर लग गए। शहर का तापमान कुछ क्षणों में 2.5 लाख सेटीग्रेड पहुंच गया। इतने अधिक तापमान में कोई कैसे जीवित रह सकता है।
फिर ऐसा दिन न आए
छह अगस्त 1945 की यह सुबह हिरोशिमा वासियों के लिए काल बनकर आई थी। यह एक दुखद मृत्यु की सुबह थी और नौ अगस्त 1945 की दोपहर नागासाकी शहर के लिए कयामत बनकर आई थी। जब अमेरिका ने वहां “फैट मैन” नामक फूलोटियम बम गिराया था। जापान के जनता की दिलों में दो दिन की तारीखों से मिलने वाले जख्म शायद ही कभी भर पाएंगे। मानव समाज को चाहिए कि वह ऐसी स्थिति फिर किसी भी देश को न देखनी पड़े। इस तरह के हालात फिर न बनने दें। सभी देश के नागरिक परमपिता परमात्मा के अविनाशी ज्ञान को जरूर प्राप्त करें। भक्ति भजन करते हुए सदभावना से रहे। जिससे फिर कभी ऐसी घातक हथियार धरती पर न फटें।

(लेखक महात्मा सत्यबोधानंद मानव सेवा संस्थान के कुमाऊं मंडल अध्यक्ष हैं। मानव उत्थान और धर्म प्रचार-प्रसार के लिए सत्संग, प्रवचन आदि करते हैं)





