भारत में प्रत्येक 15 मिनट में एक ऐसा बच्चा जन्म ले रहा है जो दिल में छेद यानी कंजेनिटल हार्ट डिजीज (सीएचडी) की समस्या से पीड़ित है। इसके चलते हृदय रोग से पीड़ित बच्चों की संख्या में लगातार बढ़ रही है। खर्चीले उपचार और सरकारी क्षेत्र में बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी सेंटरों की कमी के चलते सीएचडी पीड़ित बच्चों को कष्टप्रद जीवन जीना पड़ रहा है।
आरएमएल अस्पताल के बाल रोग विभाग के अध्यक्ष एवं बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी के प्रो. दिनेश कुमार यादव ने कहा, जन्मजात हृदय दोष या दिल में छेद होने की समस्या से पीड़ित बच्चों की संख्या करीब दो लाख है। ऐसे बच्चों के उपचार के लिए जरूरी बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी सेंटर की संख्या जरूरत से बहुत कम है। पीड़ित बच्चे को जन्म के पहले वर्ष में ही इलाज मिल जाए तो उसकी सेहत और जीवन प्रत्याशा में वृद्धि हो सकती है। आरएमएल अस्पताल ने अपने बाल चिकित्सा कार्डियोलॉजी सेंटर में दिल में छेद का इलाज करवा चुके बच्चों व उनके अभिभावकों को आमंत्रित किया और उनके साथ सीएचडी जागरूकता सप्ताह मनाया।
मां का दूध पीने में परेशानी
जन्मजात हृदय दोष से पीड़ित बच्चे को मां का दूध पीने में दिक्कत होती है। दूध पीते समय पसीना आता है। इसके अलावा पसली चलना, निमोनिया होना, शारीरिक विकास न होना, वजन न बढ़ना, सीने में दर्द होना, सांस फूलना, दिल की धड़कन तेज होना या अनियमित होना, आसानी से थक जाना, चक्कर आना जैसी अनेक समस्याएं दिख सकती हैं।
नए केंद्र खोलने की जरूरत
हृदय रोग से पीड़ित बच्चों के दिल की सिकुड़न, वाल्व की दिक्कत व अन्य गंभीर रोगों के इलाज के लिए सर्जरी जरूरी होती है, लेकिन बच्चों के हार्ट की सर्जरी की सुविधा उत्तर भारत में दिल्ली, जोधपुर, अलीगढ़ और जबलपुर में ही उपलब्ध है। इनमें आरएमएल अस्पताल भी शामिल है। ऐसे नए केंद्र खोले जाने की जरूरत है जहां हार्ट सर्जन, बाल रोग चिकित्सक, प्रशिक्षित टेक्नीशियन और मशीनें उपलब्ध हों। इन केंद्रों में बाल रोग चिकित्सक भी इको टेस्ट करने में पारंगत हो, इसके लिए उन्हें प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।





