ब्रज से हाेते हुए उत्तराखंड पहुंची रामलीला, अद्भुत है गीत-नाट्य शैली

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शारदीय नवरात्र के साथ शाम सर्द होने लगती है। बदलते मौसम के बीच कुमाऊं में रामलीला का मंचन शुरू हो जाता है। कई इलाकों में यह दिवाली और उसके आसपास तक जारी रहता है। कुमाऊं अंचल में प्रचलित रामलीला गीत-नाट्य शैली पर आधारित होती है। इसमें शास्त्रीयता का समावेश मिलता है। कहते हैं रामलीला मंचन की परंपरा ब्रज से शुरू होकर कुमाऊं तक पहुंची। रामलीला की शैली, गायन, ताल, छंद का जो नाट्य रूप था, इसी से अभिप्रेरित होकर कुमाऊं के विद्वानों के मन में रामलीला को नया रूप देने का विचार आया और यहीं से ‘कुमाऊं की रामलीला’ उभर कर आई।

शुरुआत में मौखिक होती थी रामलीला

कुमाऊं की रामलीला के जानकार कहते हैं कि ब्रज की रासलीला के अतिरिक्त ‘नौटंकी शैली’ व पारसी रंगमंच का प्रभाव कुमाऊं की रामलीला में मिलता है। लेखक चंद्रशेखर तिवारी के मुताबिक कुमाऊं की रामलीला विशुद्ध मौखिक परंपरा पर आधारित थी, जो पीढ़ी दर पीढ़ी लोक मानस में रचती-बसती चली गई। शास्त्रीय संगीत के तमाम पक्षों का ज्ञान न होते हुए भी लोग सुनकर ही इन पर आधारित गीतों को सहजता से याद कर लेते थे।

कुमाऊंनी नहीं ये है कुमाऊं की रामलीला

लेखक डा. पंकज उप्रेती अपनी पुस्तक ‘कुमाऊं की रामलीला अध्ययन एवं स्वरांकन’ में लिखते हैं, तमाम विविधता समेटे होने के बावजूद कुमाऊं में प्रचलित होने के कारण यहां की रामलीला को ‘कुमाऊंनी रामलीला’ संबोधित कर दिया जाता है। जबकि लोक का प्रकटीकरण नहीं होने के कारण इसे ‘कुमाऊं की रामलीला’ कहना उचित रहेगा।

ब्रजेंद्र लाल साह ने लोक धुनों को पिरोया

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल में ‘कुमाऊंनी रामलीला’ का भी प्रचलन है। हालांकि स्वरांकन न हो पाने के कारण यह प्रचलन में कम है। लेखक डॉ. पंकज उप्रेती के मुताबिक ‘कुमाऊंनी रामलीला’ पूरी तरह लोक पर आधारित है। इसकी बोली-भाषा से लेकर संगीत पक्ष तक कुमाऊं से उठाया गया है। 1957 में रंगकर्मी स्व. ब्रजेंद्र लाल साह ने लोक धुनों के आधार पर रामलीला गीत-नाटिका की रचना की। स्व. डॉ. एसएस पांगती के प्रयासों से पिथौरागढ़ के दरकोट में ‘कुमाऊंनी रामलीला’ का मंचन शुरू हुआ, जो आज तक जारी है।

देवेंद्र पांगती ने ऑडियो रूप में किया संकलित

लेखक स्व. शेर सिंह पांगती की प्रेरणा से रंगकर्मी देवेंद्र पांगती ‘देवु’ ‘कुमाऊंनी रामलीला’ को ऑडियो रूप में संकलित करते में जुटे हैं। देव पांगती ने 2018 में इस दिशा में का शुरू किया। दो साल में सात अध्यायों का संकलित कर लिया है। देवेंद्र पांगती कहते हैं एक बार ऑडियो रूप में संकलित होने के बाद कहीं भी ‘कुमाऊंनी रामलीला’ का मंचन आसान हो जाएगा। शुरुआत में इसमें लोक गायक पप्पू कार्की व ममता आर्या ने आवाज दी।

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