जंगली जानवर बड़े पैमाने पर खेती को नुकसान पहुंचाकर किसानों की आय दोगुनी करने की मंशा पर पानी फेर रहे हैं। जंगली जानवरों के भय से पर्वतीय क्षेत्रों में कई किसानों ने आलू, मक्का, गडेरी, पिनालू की खेती करना छोड़ दिया है। पर्वतीय क्षेत्र में गेहूं, धान, आलू, अदरक, सोयाबीन, भट, गहत आदि का रकबा कम हो रहा है। खरीफ व रबी फसलों में गेहूं, धान, दालों आदि की उपज लेने के साथ चंपावत जिले में 8178 हेक्टेयर में फल व 5437 हेक्टेयर में सब्जी उत्पादन होता है। जंगली सूअर, बंदर, लंगूर, सेही आदि के बढ़ते आतंक की वजह से खेती करना मुश्किल हो गया है।
किसानों ने आलू, मक्का की बुआई करना छोड़ा
चंपावत, लोहाघाट, पाटी व बाराकोट ब्लाकों में किसानों ने 234 हेक्टेयर में आलू, मक्का, पिनालू आदि लगाना बंद कर दिया है। लोहाघाट नगर से लगे सुंई, रायनगर चौड़ी, फोर्ती, बनगांव, कोलीढेक, कर्णकरायत आदि गांवों में किसान अदरक व हल्दी का उत्पादन कर रहे हैं। प्रगतिशील किसान तारा दत्त खर्कवाल, भुवन चौबे, हरीश राय, जीवन चंद्र बताते हैं कि बंदर पाली हाउस को भी नुकसान पहुंचा जा रहे हैं। मैदानी क्षेत्र में हाथी व नीलगाय फसलों को नष्ट कर रही है। छीनीगोठ, सैलानीगोठ, उचौलीगोठ, थ्वालखेड़ा, आमबाग, गैंडाखाली, ज्ञानखेड़ा बिचई, बस्तिया, बनबसा के फागपुर, गड़ीगोठ, भैंसाझाला में जंगली जानवर मुसीबत बन रहे हैं।
पिछले 15 वर्षों में बढ़ गया बंदरों का आतंक
किसान चंद्रमणी बताते हैं कि दो दशक पहले तक बंदर, लंगूरों का आतंक कम था। 2010 के बाद इनकी संख्या तेजी से बढ़ती गई। अब गांवों से लेकर नगरों तक बंदर का आतंक दिखा जाता है। वन विभाग बीच-बीच में अभियान चलाकर बंदरों को पकड़कर रेसक्यू सेंटर ले जाता है। प्रभावी नियंत्रण की योजना वन विभाग के पास नहीं है।
एक दशक में 40 प्रतिशत खेती घटी कृषि विभाग के अनुसार वर्ष 2010-11 में चंपावत जिले में 9435 हेक्टेयर में गेहूं बोया गया था। 2021-22 में 39.6 प्रतिशत घटकर 5701 हेक्टेयर रह गया। 10 वर्षों में धान बुआई क्षेत्र 7216 हेक्टेयर से 34 प्रतिशत कम होकर 4764 रह गया। इस अवधि में मक्का 592 से घटकर 532 हेक्टेयर व मडुआ 5858 से कम होकर 3402 हेक्टेयर पर आ गया। विशेषज्ञों की मानें तो खेती का रकबा कम होने के पीछे जंगली जानवरों के अलावा कुछ अन्य कारण भी हैं।
वन विभाग अपने ओर से प्रयास कर रहा: एसडीओ
चंपावत प्रभाग में कार्यरत वन एसडीओ प्रशंसा टम्टा कहती हैं कि जंगली जानवरों के आतंक से निजात के लिए विभागीय स्तर पर प्रयास किए जा रहे हैं। बंदरों को पकड़कर बध्याकरण के लिए रेसक्यू सेंटर भेजा जाता है। सूअरों को खेतों मेंं ही मारने के लिए नियमानुसार लाइसेंस जारी हाेता है। मैदानी क्षेत्र में सोलर फेंसिंग लगाने पर जोर दिया गया है।




