निराशा दूर कर आत्मबल जगाती है श्रीमद्भागवत गीता, गीता जयंती का महत्व

धर्म/समाज/संस्था

बुधवार, 11 दिसंबर को गीता जंयती है। द्वापर में महाभारत युद्ध शुरू होने से पहले श्रीकृष्ण ने अर्जुन के मोह और संशय दूर करने के लिए गीता उपदेश दिया था। उस दिन मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी थी। इसीलिए मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी पर गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है।
गीता के 18 अध्यायों में 700 श्लोक हैं। श्रीकृष्ण ने अर्जुन को जो ज्ञान दिया, अगर वह ज्ञान हम अपने जीवन में उतार लें तो हमारी भी सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। यह दिन धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इस तरह करें गीता जयंती पूजन
प्रातःकाल ब्रह्म मुहूर्त में जागकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें। भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हुए उनकी पूजा विधिपूर्वक करें। सूर्य देव को जल अर्पित करने के बाद श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र पर चंदन, पुष्प और दीपक अर्पित करना चाहिए। भगवद्गीता के ग्रंथ को चंदन और तिलक लगाकर पूजा करें। इसके बाद गीता के श्लोकों का पाठ करें और गीता की आरती करें।

गीता पाठ करने का महत्व
शास्त्रों में बताया गया है कि गीता का नियमित पाठ करने से घर में सुख-समृद्धि आती है। नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। यह ग्रंथ धर्म, कर्म, नीति, सफलता, सुख और जीवन प्रबंधन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों से परिपूर्ण है। गीता का पाठ न केवल आत्मबल को बढ़ाता है, बल्कि हर परिस्थिति का सामना करने की क्षमता भी प्रदान करता है।
(लेखक डा. नवीन चंद्र जोशी श्री महादेव गिरि संस्कृत महाविद्यालय हल्द्वानी के प्राचार्य और धर्म-शास्त्र के व्याख्याता हैं। पर्वतलोक के लिए नियमित रूप से लेखन करते रहेंगे।)

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