उत्तराखंडी खानपान में गहत की दाल प्रमुखता से शामिल है। शायद ही कोई परिवार होगा जहां गहत की दाल न बनती हो। गहत की दाल बड़ी गुणकारी होती है। इसे हर पहाड़ी के अलावा आयुर्वेद और खानपान विशेषज्ञ भी बताते हैं। गहत का पानी पीने से पथरी तक कट जाती है। पुराने लोग बताते थे कि जब रासायनिक विस्फोटक नहीं हुआ करते थे तो पत्थरों व चट्टानों को तोड़ने में गहत की दाल का पानी प्रयोग में लाया जाता था। हालांकि वैज्ञानिकों व इंजीनियरों की ओर से इस तरह को कोई प्रमाण मैंने नहीं पढ़ा। गहत के पथरी में लाभदायक होने की बात उत्तराखंड के अलावा पंजाब, हिमाचल, जम्मू-कश्मीर आदि में भी कही जाती है।
पथरी रोगियों को देती है आराम
गहत को कुल्थ भी कहा जाता है। पंजाब में कुल्थ उगाई नहीं जाती, न इसका सेवन होता है। हिमाचल प्रदेश के निचले हिस्सों के जिलों ऊना, कांगड़ा, हमीरपुर आदि से पंजाब पहुंचने वाली गहत को पत्थरी के उपचार में रूप में करने की बात कही जाती है। हिमाचल में लाल-गेरुवे रंग की छोटे आकार की गहत होती है। उत्तराखंड में गहरे भूरे-काले रंग की गहत ज्यादा चलन में है। गहत का कुल्थी नाम गुजराती है, जबकि हिंदी में इसे कुलथ कहा जाता है। अंग्रेजी नाम हॉर्स ग्राम Horse Gram है।
महानगरों तक में गहत का इंतजार
गहत का सर्वाधिक उत्पादन कर्नाटक में होता है। हालांकि गहत की दाल का सर्वाधिक उपयोग उत्तराखंड में होता है। देश की 28 प्रतिशत गहत कर्नाटक व 10-10 प्रतिशत तमिलनाडु, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा आदि में हाेती है। हल्द्वानी, देहरादून और दूसरे शहरों में बसे उत्तराखंडी इंतजार में रहते हैं कि कहीं गांव से उनके लिए गहत पहुंचे। अपने परिचितों से गहत की दाल का इंतजाम करने को कहा जाता है। गहत की दाल की कीमत 160 से 180 रुपये किलो तक रहती है। चंपावत के देवीधुरा, पाटी, लोहाघाट, अल्मोड़ा के शहरफाटक, लमगड़ा, धौलादेवी क्षेत्र में गहत की उपज होती है। गढ़वाल में टिहरी व जौनसार क्षेत्र में उत्पादन होता है।





