कोविड काल में ट्यूशन व अन्य फीस माफी के विरोध में दाखिल याचिका रद्द

न्यायालय शिक्षा/रोजगार

कोरोना काल में ट्यूशन फीस और अन्य शिक्षण शुल्क माफ करने के राज्य सरकार के आदेश को चुनौती देती याचिका को हाई कोर्ट ने रद्द कर दिया। हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि सरकार को फीस माफी का आदेश जारी करने का संवैधानिक अधिकार है।
कोविड-19 महामारी के दौरान छात्रों से ट्यूशन फीस के अलावा अन्य शुल्क माफ करने के सरकारी आदेश को चुनौती देती याचिका को हाई कोर्ट ने खारिज कर दिया है।देहरादून के प्रतिष्ठित वेल्हम ब्वायज स्कूल की ओर से राज्य सरकार के आदेश को चुनौती दी गई थी। कोविड-19 काल में जब स्कूलों में कक्षाएं भौतिक रूप से संचालित नहीं हो रही थीं तो दून के इस विद्यालय ने 2021 की शुरुआत में जारी आदेश को रद करने के लिए याचिका दायर की थी।

सरकार के अधिवक्ता ने दिए कई तर्क
वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी व न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ में याचिकाकर्ता ने कहा था कि सरकार के पास निजी गैर-सहायता प्राप्त आवासीय विद्यालयों की फीस से संबंधित आदेश जारी करने का अधिकार नहीं है। कोर्ट ने कहा राज्य सरकार संविधान के अनुच्छेद-162 के तहत अपनी शक्ति का प्रयोग कर आदेश जारी कर सकती है। कोविड-19 महामारी और उसके परिणामस्वरूप लगाए लाकडाउन के कारण उत्पन्न आकस्मिक स्थिति को देखते हुए राज्य सरकार का निजी गैर-सहायता प्राप्त आवासीय विद्यालयों को उन सेवाओं के लिए शुल्क न लेने के लिए आवश्यक निर्देश जारी करना उचित था, जिनका लाभ छात्रों ने उस अवधि के दौरान नहीं उठाया था।

स्कूल ने कई मद में वसूला शुल्क
सुनवाई में सरकार के अधिवक्ता ने कहा जब देश कोविड-19 की चपेट में था और शिक्षा संस्थान बंद थे, तब निजी गैर-सहायता प्राप्त आवासीय विद्यालय छात्रों से न केवल ट्यूशन फीस, बल्कि छात्रावास शुल्क, मेस और कपड़े धोने का शुल्क, घुड़सवारी के लिए शुल्क, विकास शुल्क, तैराकी शुल्क आदि जैसी विभिन्न अन्य श्रेणियों के तहत शुल्क भी वसूल रहे थे। मुख्य स्थायी अधिवक्ता सीएस रावत ने स्पष्ट किया, जब कक्षाएं ऑनलाइन मोड पर चल रही थीं तो कोई भी आवासीय विद्यालय ऐसे शुल्क नहीं ले सकता था। यहां तक कि रखरखाव के नाम पर भी नहीं। सरकारी आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि ऐसे स्कूल, जिनमें अन्य डे स्कूल भी शामिल हैं, ऑनलाइन कक्षाओं के लिए केवल ट्यूशन फीस ले सकते हैं।

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