भागीरथी आमा की पहल से बंजर धरा ने ओढ़ी हरियाली, पानी की उपलब्धता से सब्जी की इफरात

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मुश्किल कार्य को संभव कर दिखाने के लिए भगीरथ प्रयास का उल्लेख किया जाता है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर हम भागीरथी प्रयास से बंजर भूमि को हरियाली में बदलने की दास्तां बयां कर रहे हैं। 75 वर्षीय भागीरथी आमा की प्रेरणा व पहल से गांव ने 11.6 हेक्टेयर भूमि में जंगल तैयार कर दिया। हरियाली की वजह से जगह-जगह पानी फूट पड़ा। जिससे आसपास के गांवों में पेयजल संकट भी दूर हो गया।
चंपावत जिले के खेतीखान क्षेत्र के मानर वन पंचायत ने मिसाल कायम की है। यहां की महिलाओं ने सघन वन विकसित किया है। जंगल में बांज, फल्यांट, उतीस, काफल, पांगर सहित अनेक प्रजातियों के पेड़ हैं। बदलाव की शुरुआत वर्ष 2000 में वन पंचायत गठन के साथ हुई। भागीरथी देवी पहली सरपंच चुनी गईं। गांव में पेयजल संकट था। जंगल नहीं होने से जानवरों के लिए चारा-पत्ती जुटाने मीलों दूर जाना पड़ता था। वन पंचायत के पास 116 हेक्टेयर भूमि थी, लेकिन बंजर। भागीरथी देवी ने महिलाओं को साथ लेकर पौधारोपण का बीड़ा उठाया। तीन-चार वर्षों तक बरसात में पौधारोपण करने के बाद 10 वर्षों तक बच्चों की तरह पेड़ों की देखरेख की। 2005 में भारतीय एग्रो इंडस्ट्रीज फाउंडेशन (बाएफ) ने कुछ बहुत वित्तीय व तकनीकी सहयोग दिया। जंगल के चारों ओर तार-बाड़ की। चाल-खाल, खंती, चेकडैम बनाकर भूस्खलन व वर्षा का पानी संरक्षित करने से 10-12 वर्षों में जंगल तैयार हो गया। ग्रामीणों को जंगल से चारा-पत्ती, जलावनी लकड़ी, सूखी पत्तियां मिल जाती हैं। भूमिगत जलस्तर बेहतर होने से सूख चुके गधेरों से पानी फूट गया। जिससे मानर, जनकांडे, बरकांडे गांव के साथ ही खेतीखान बाजार को पानी मिल रहा है।

भागीरथी आमा।

जंगल ने बदली गांव की आर्थिकी
जंगल तैयार होने से पारिस्थितिकीय कैसे सुधरती है, इसका उदाहरण भी मानर गांव है। पर्याप्त चारा-पत्ती होने से ग्रामीण गाय पालन कर डेरी व्यवसाय करते हैं। अधिकांश घरों में दो या एक गाय है। पर्याप्त पानी होने से किसान सब्जी उत्पादन करते हैं। खेतीखान व लोहाघाट बाजार में सब्जी की बिक्री हो जाती है। भागीरथी आमा बताती हैं कि वर्ष में दो-तीन माह के लिए जंगल को बांज की चारा-पत्ती के लिए खोला जाता है। ग्रीष्मकाल से पहले सूखी पत्तियां समेटने जंगल खुलता है। सूखी पत्ती जानवरों के बिछावन के काम आती हैं और ग्रीष्मकाल में वनाग्नि का खतरा भी नहीं रहता। जाड़ों में जंगल से सूखी लकड़ी लाने की अनुमति होती है। जंगल जाने वालों से प्रतिमाह 20 रुपये रखरखाव शुल्क लिया जाता है।

भागीरथी अम्मा के प्रयास से तैयार जंगल।

लगातार 24 वर्ष तक सरपंच रहीं आमा
भागीरथी आमा 2000 से 2024 तक सरपंच रहीं। अब बहू सुनीता देवी वन सरपंच हैं। 75 वर्ष की उम्र में भी भागीरथी आमा का उत्साह और जंगल बचाने का जज्बा कम नहीं हुआ है। वह बीच-बीच में जंगल का चक्कर लगाकर छोटे पौधों की देखरेख और चारापत्ती काटने वाली महिलाओं को निर्देशित करती हैं। ताकि पेड़ों की अच्छी छंटनी हो। चारापत्ती भी मिले और जंगल भी बचा रहे। पूर्व ग्राम प्रधान मंजू मनराल कहती हैं कि महिलाएं जंगल को अपने मायके की तरह मानती हैं। जंगल से लोग इस कदर जुड़े हैं कि वर्षों से जंगल में वनाग्नि का मामला सामने नहीं आया है।

मानर वन पंचायत का काम बहुत अनुकरणीय है। गांव ने जंगल की महत्ता को समझा है। जंगल देखकर समझा जा सकता है कि भागीरथी आमा और गांव की महिलाओं ने किस तरह इसे संवारा है। हम दूसरी वन पंचायतों को भी प्रेरित कर रहे हैं।
नवीन पंत, डीएफओ, चंपावत वन प्रभाग

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